गौसेवा के नाम पर अनुदान और भूमि उपयोग पर उठे सवाल, विशेष ऑडिट की मांग तेज पिंजरापोल गौशाला प्रबंधन पर अनियमितताओं के आरोप, भूमि उपयोग और दान सामग्री की जांच की उठी मांग

 


जयपुर। राजधानी जयपुर के टोंक रोड स्थित सांगानेर क्षेत्र में संचालित श्री पिंजरापोल गौशाला एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। गौसेवा और गौसंरक्षण के नाम पर मिलने वाले सरकारी अनुदान, दान सामग्री और गौशाला की भूमि के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और गौसेवा से जुड़े संगठनों ने पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।





जानकारी के अनुसार संबंधित गौशाला के नाम पर दौसा जिले में करीब 850 बीघा तथा जयपुर में लगभग 293 बीघा भूमि दर्ज बताई जा रही है। आरोप है कि इतनी विशाल भूमि होने के बावजूद गौशाला में अपेक्षाकृत कम संख्या में गौवंश का पालन किया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि दौसा क्षेत्र में करीब 500 तथा जयपुर में लगभग 2500 गायों की ही देखभाल की जा रही है।


गौसेवा कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि उपलब्ध भूमि का समुचित उपयोग हरा चारा, पशु आहार और जैविक खेती के लिए किया जाए तो गौशालाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकती हैं तथा सरकारी अनुदान पर निर्भरता भी कम हो सकती है।

मामले में यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि गौसेवा के लिए दानदाताओं द्वारा दिए जाने वाले चारे और अन्य सामग्री का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। आरोपों के अनुसार गौशाला परिसर में आने वाले श्रद्धालुओं और लोगों को चारा बेचा जाता है तथा चारा बिक्री का ठेका निजी स्तर पर दिया गया है। बताया जा रहा है कि यह ठेका करीब 30 लाख रुपए तक में दिया जाता है।


इसके अलावा दानदाताओं के सहयोग से निर्मित सुरभि सदन और सत्संग भवन के उपयोग को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि इन भवनों का उपयोग गौसेवा गतिविधियों के बजाय विवाह समारोह, निजी कार्यक्रमों और विद्यालय संचालन के लिए किया जा रहा है। परिसर में नए निर्माण कार्य भी जारी होने की बात सामने आई है, जिस पर आपत्ति जताई जा रही है।




अधिवक्ता मुनीश कुमार शर्मा द्वारा जारी विधिक नोटिस में भूमि उपयोग, निर्माण गतिविधियों और गौशाला की मूल भावना से हटकर हो रही गतिविधियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। नोटिस में कहा गया है कि यदि समय रहते स्थिति की जांच नहीं हुई तो भविष्य में भूमि दुरुपयोग और अनियमितताओं की आशंका बढ़ सकती है।

गौसेवा से जुड़े लोगों ने राज्य सरकार, पशुपालन विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि गौशालाओं को मिलने वाले सरकारी अनुदान और दान राशि का पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित होना चाहिए ताकि वास्तविक गौसेवा प्रभावित न हो।

प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

पिछले 10 वर्षों का विशेष ऑडिट कराया जाए

वास्तविक गौसंख्या एवं मृत्यु दर की स्वतंत्र जांच हो

सरकारी अनुदान और दान राशि के उपयोग की जांच की जाए

प्रदूषित जल से चारा उत्पादन पर रोक लगाई जाए

आवश्यकता पड़ने पर प्रशासक नियुक्त किया जाए

अवैध निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों पर कार्रवाई हो

गौसेवा कार्यकर्ताओं का कहना है कि गौशालाएं केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं बल्कि पशु संरक्षण और सामाजिक सेवा का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। ऐसे में यदि कहीं भी अनियमितताओं की शिकायत सामने आती है तो उसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है, ताकि आमजन का विश्वास बना रहे और गौसेवा की मूल भावना सुरक्षित रह सके।

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