राज्यपाल ने प्रदर्शनी में महाराणा प्रताप की हाथी पर सवार प्रतिमा सहित हल्दीघाटी युद्ध की स्मृतियों को जीवंत करती विभिन्न कलाकृतियों का अवलोकन कर उनकी सराहना की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि महान इतिहास सदैव समाज को ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप और अकबर के मध्य हुआ, लेकिन अकबर स्वयं युद्धभूमि में उपस्थित नहीं था।
श्री बागडे ने कहा कि अंग्रेजों ने भारतीय इतिहास, संस्कृति और परंपराओं को भुलाने के अनेक प्रयास किए तथा ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किए गए जो भारतीयता से दूर ले जाने वाले थे। उन्होंने कहा कि हल्दीघाटी युद्ध और मेवाड़ की गौरवशाली परंपराओं पर आधारित यह प्रदर्शनी नई पीढ़ी को अपने इतिहास से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी।
राज्यपाल ने कहा कि यदि और महाराणा प्रताप का कालखंड एक होता तो परिस्थितियां और अधिक अनुकूल होतीं। उन्होंने मेवाड़ को वीरों की भूमि बताते हुए कहा कि इस क्षेत्र ने कभी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। उन्होंने बप्पा रावल के पराक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके साहस और नेतृत्व ने विदेशी आक्रमणकारियों को भारत से खदेड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि अकबरनामा को दरबारी इतिहास के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें अनेक भारतीय वीरों और वीरांगनाओं के शौर्य का समुचित उल्लेख नहीं मिलता। इस दौरान उन्होंने राजस्थान की किरण कुमारी के साहस का भी उल्लेख किया।
कार्यक्रम में नगरीय विकास मंत्री , वित्त आयोग के अध्यक्ष तथा विधायक सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
इस अवसर पर मूर्तिकार ने बताया कि उनके द्वारा देश-विदेश में महाराणा प्रताप की 100 से अधिक प्रतिमाएं स्थापित की जा चुकी हैं। उन्होंने प्रदर्शनी की अवधारणा और इसमें प्रदर्शित शिल्प कृतियों की विस्तृत जानकारी भी दी।
कार्यक्रम से पूर्व राज्यपाल ने महाराणा प्रताप की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।


