जयपुर। कलावर्त द्वारा आयोजित तथा सुरूचि केंद्र, विद्याश्रम परिसर में संपन्न “युवा एकल – Renewing Solo Kathak Tradition” श्रृंखला के अंतर्गत पुणे की प्रतिभाशाली कथक नृत्यांगना अमृता परांजपे ने अपनी प्रभावशाली एकल प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वे गुरु शांभवी दांडेकर की शिष्या हैं और अपनी सटीक लयबद्धता, सशक्त रचनाओं एवं गहन अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ विलंबित ताल में गणेश वंदना “सुमिरन करो गणेश” (राग यमन) से हुआ, जिसमें उनकी संतुलित प्रस्तुति और गंभीरता ने मंच पर आध्यात्मिक वातावरण का सृजन किया। इसके बाद उन्होंने आमद, विभिन्न प्रकार के परन, चक्रदार तोड़ा, गणेश परन, शिव परन, दुर्गा परन तथा बादल-बिजली परन प्रस्तुत कर अपनी लयकारी और जटिल तालयुक्त संरचनाओं पर उत्कृष्ट पकड़ का परिचय दिया।
अभिनय पक्ष में उन्होंने प्रौढ़ा खंडिता नायिका का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया, जो विलंबित झपताल में राग रामकली पर आधारित “वही जाओं बालमा” पर निबद्ध था। उनकी भाव-अभिव्यक्ति ने नायिका के अंतर्द्वंद्व और संवेदनाओं को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया।
इसके उपरांत निंदा स्तुति “बड़े भोले बने नाथ” की प्रस्तुति दी गई, जिसमें पार्वती द्वारा शिव से समय न देने पर किया गया व्यंग्यात्मक संवाद जीवंत हो उठा।
कार्यक्रम का समापन तीनताल की पारंपरिक बंदिश, सवाल-जवाब और घूंघट की गत-निकास के साथ हुआ, जिसमें उनकी मंच पर पकड़, परंपरागत शैली और लयकारी स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई।
इस प्रस्तुति में गायन एवं पढ़ंत पर जयदीप वैद्य, तबले पर मोहित चौहान तथा सितार पर मोहम्मद इरफान ने प्रभावी संगत दी, जिसने कार्यक्रम को और अधिक समृद्ध बनाया।
“युवा एकल” श्रृंखला का उद्देश्य एकल कथक परंपरा को पुनर्जीवित करना है, और इस कड़ी में अमृता परांजपे की प्रस्तुति ने इस उद्देश्य को सार्थक रूप से आगे बढ़ाया।

