कृष्ण से दोस्ती, कष्टों से मुक्ति – श्रीजी महाराज

 


जयपुर। सांगानेर के डिग्गी मालपुरा रोड स्थित जगन्नाथपुरा में 8 फरवरी से आयोजित भागवत रस वर्षण महोत्सव के समापन सत्र में श्री श्याम शरण देवाचार्य (निम्बार्क तीर्थ सलेमाबाद, किशनगढ़-अजमेर) ने कृष्ण-सुदामा की अनुपम मित्रता का भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

श्रीजी महाराज ने अपने प्रवचनों की शुरुआत मधुर भजन “अरे द्वारपालों, कन्हैया से कह दो…” से की और कहा कि विपत्ति में साथ देने वाला ही सच्चा मित्र होता है। उन्होंने कहा कि आज सोशल मीडिया पर हजारों मित्र बन जाते हैं, लेकिन कठिन समय में साथ खड़ा होने वाला मित्र ही वास्तविक होता है। “हजारों मित्रों की आवश्यकता नहीं, एक ऐसा मित्र पर्याप्त है जो तन-मन-धन से हर समय सहयोग को तत्पर रहे,” उन्होंने संदेश दिया।



कृष्ण-सुदामा प्रसंग सुनाते हुए महाराज ने बताया कि निर्धनता से व्यथित सुदामा अपनी पत्नी सुशीला के आग्रह पर अपने मित्र श्रीकृष्ण से मिलने मथुरा पहुंचे। भेंट स्वरूप एक मुट्ठी चावल लेकर गए सुदामा को देखकर भगवान श्रीकृष्ण नंगे पांव महल द्वार तक दौड़े और गले लगा लिया। उन्होंने सुदामा के चरण पखारे और प्रेमपूर्वक चावल ग्रहण किए। कथा के माध्यम से संदेश दिया गया कि सच्ची मित्रता में दंभ या अहंकार का स्थान नहीं होता।

महाराज ने कहा कि आज यदि कोई गरीब मित्र घर आ जाए तो लोग उसे उपेक्षित कर देते हैं, जबकि श्रीकृष्ण ने सुदामा को सम्मान देकर यह दर्शाया कि सच्चा प्रेम और मित्रता जीवन के कष्टों से मुक्ति दिलाती है।

उन्होंने परिवार और रिश्तों के महत्व पर भी प्रकाश डाला और कहा कि समाज में यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि रिश्तेदार उन्नति से जलते हैं, जबकि आज भी अधिकांश पारिवारिक कार्यक्रम रिश्तेदारों के सहयोग से ही संपन्न होते हैं। “वसुधैव कुटुंबकम की भावना से जीवन जीना चाहिए,” उन्होंने कहा।

कार्यक्रम में निम्बार्क परिकर सर्वेश्वर शर्मा ने कहा कि कृष्ण-सुदामा की मित्रता से प्रेरणा लेकर हमें मित्रों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों की हर संभव सहायता करनी चाहिए तथा स्नेहभाव से जीवन व्यतीत करना चाहिए।

श्रीजी महाराज के निजी सचिव एवं कार्यक्रम प्रबंधक ओमप्रकाश शर्मा ने कथा में पधारे संत-महात्माओं, विशिष्ट अतिथियों, जनप्रतिनिधियों एवं उद्यमियों का स्वागत कर गुरुदेव से आशीर्वाद दिलवाया।

आयोजन से जुड़े नाथूलाल शर्मा ने टीम सहित श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरित की। आयोजनकर्ता हनुमान कंडीरा ने आरती कर गुरुदेव को भेंट प्रदान करते हुए ससम्मान विदा किया।

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